एक मासूम की मौत और जीवन का सबसे कठिन प्रश्न

बारह साल का एक बच्चा।
मां पहले चली गई।
पिता भी चले गए।
जीवन ने बचपन तक पूरा नहीं होने दिया।
और अंत… एक मगरमच्छ के जबड़ों में।
यह पढ़ते ही मन पूछता है—
आखिर उसका अपराध क्या था?
लेकिन शायद इससे भी बड़ा प्रश्न है—
क्या जीवन वास्तव में उतना न्यायपूर्ण है, जितना हमारा मन उसे मान लेना चाहता है?
हम हर घटना का कारण ढूंढ़ते हैं।
कभी कर्म में,
कभी भगवान में,
कभी भाग्य में।


पर कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो हमारे सारे उत्तर तोड़ देती हैं।
तभी पहली बार समझ आता है कि हम जिस संसार को स्थायी, सुरक्षित और अपने नियंत्रण में मान बैठे हैं, वह वास्तव में एक क्षणभंगुर प्रवाह है।
सुबह जो बच्चा खेत में धान रोप रहा था,
शाम तक उसका शरीर भी पूरा नहीं बचा।
जिस चाचा ने उसका हाथ पकड़कर सात मिनट तक मौत से लड़ाई लड़ी,
उसी चाचा को अगले दिन अपने भतीजे का निर्जीव शरीर गोद में उठाकर पोस्टमॉर्टम हाउस तक ले जाना पड़ा।
यही संसार है।


आज जिसे हम “मेरा” कहते हैं,
वह अगले ही क्षण स्मृति बन सकता है।
हम धन जोड़ते हैं,
प्रतिष्ठा जोड़ते हैं,
अपमानों का हिसाब रखते हैं,
लोगों से लड़ते हैं,
ईर्ष्या पालते हैं,
घृणा जमा करते हैं।
लेकिन मृत्यु को इनमें से किसी से कोई मतलब नहीं।
वह न उम्र पूछती है,
न तैयारी,
न योजनाएं।
वह बस आ जाती है।
शायद अध्यात्म का जन्म इसी बोध से होता है।
संन्यास का अर्थ घर छोड़ देना नहीं,
बल्कि उस भ्रम को छोड़ देना है कि यह संसार हमें स्थायी सुख दे देगा।
बुद्ध ने कहा था— “दुःख को देखकर ही जागरण की शुरुआत होती है।”
जब तक मृत्यु केवल दूसरों के साथ घटती हुई घटना लगती है, तब तक हम सोए रहते हैं।
जिस दिन किसी सुनील की कहानी हमारे भीतर उतर जाती है, उसी दिन पहला प्रश्न जन्म लेता है—
मैं कौन हूँ?


अगर सब कुछ एक दिन छूट जाना है,
तो मैं जीवन किसके लिए जी रहा हूँ?
इसी प्रश्न से भीतर की यात्रा शुरू होती है।
हो सकता है इस यात्रा में भगवान मिले या न मिले,
लेकिन इतना निश्चित है कि स्वयं से मुलाकात अवश्य होगी।
और शायद वही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।


लेखक: यशवंत सिंह
संपादक, भड़ास4मीडिया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *